
आज एक गाना सुना...
कई बार युही देखा है , ये जो मन की सीमा रेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे , अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है....
एक बार सुना .. फिर दूसरी बार ... और फिर न जाने कितनी बार बस सुनती ही चली गयी .. जिंदगी की सारी उलझनों को कितनी आसानी से शब्दों में पिरो दिया है योगेश जी ने.. काफी दिनों से अपनी जिंदगी को लेकर हैरान परेशान सी थी मैं .. बोहोत डर लग रहा था की क्या होगा कॉलेज ख़त्म होने के बाद .. और थोडा डर तो शायद अब भी कही न कही अन्दर है ही जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से बहला फुसला कर सुला दिया है पर वो कब फिर जाग जायेगा मुझे नही पता .. क्या सच में स्कूल और कॉलेज के जिन जिंदगी के सबसे अच्छे दिन होते है ??
क्या इससे ज्यादा ख़ुशी और आराम की जिंदगी अब सच में नही मिलेगी ??? ऐसे ही न जाने कितने सवाल हमेशा मुझे घेरे रहते है .... सच में ऐसा लग रहा है की किसी अनजानी प्यास के पीछे , अनजानी आस के पीछे मन दौड़ रहा है... पर उस अनजानी प्यास को मैं समझ ही नही पा रही ... क्या है आखिर इस जीवन का लक्ष्य ?? plzzz सहायता कीजिये .....